अल्फाजों के दरिया में, ज़रा खुद को डुबा लो
खौलते जज्बातों में, ज़रा खुद की उबालो।
मै तो हमेशा लिखता हूं, सुनाता हूं अक़्सर
मेरे साथ बैठो, ज़रा शायरी बना लो।
तुम्हे नहीं इल्म, कि किस क़दर के शायर हो तुम
तुम ही हो तवज्जुह, और तुम ही हो तरन्नुम
मै तो रोज़ अंगार रखता हूं, अपने कलेजे पर
मान के मेरी तुम, जरा खुद को जला लो।
कभी लिखो हुस्न पर, कभी लिखो हिजाबों पर
कभी बोलो बारूद पर, कभी कहो किताबों पर
अपनों को करो शामिल, अपनी कलम की मसरूफियत में
और ना छोड़ो गैरों को भी, खुद की शायरी में सजा लो।