# काव्योत्सव के लिए
भावनात्मक कविता
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कविता- प्रतिबिंब
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अनजानो की भीड़ में
कुछ अपने कुछ बेगानों में
सदा खड़ा मेरे संग में
वह बनकर मेरा अपना सा
प्रतिबिंब मेरे अस्तित्व का
कभी धूप में साथ निभाता
कभी छांव में दूर हो जाता
कभी हंसाता कभी रुलाता
सतत जीवन का सार बताता
प्रतिबिंब मेरे अनुभव का
कभी सुख का संगी बन जाता
कभी दुख में ढाढस बंधाता
अकेलेपन में साथी बन जाता
दर्द का मेरे वह हमदम
प्रतिबिंब मेरे जीवन का
जीने का आधार बताता
मुश्किलों से कभी न हार मानता
टूटे ख्वाब बिखरे सपनों का
बनकर संबल खडा अडिग सा
हर पल उम्मीद को देता पहचान
प्रतिबिंब मेरे सपनों का।
अर्चना राय, भेडाघाट, जबलपुर (मप्र)