#काव्योत्सव -2.0
विषय- भावना प्रधान
" मेरी कविता "
कितना सुकून मिला, जब मैंने ये कर दिखाया,,
ये सोच आज मन भर आया।
इस दौड़ती भागती जिंदगी में,
खुद को कहां से कहाँ पाया।
कभी बेटी बनकर, कभी बहू बनकर,
एक साथ कई फ़र्ज़ को निभाया।
कभी किताबों से लड़ती हूँ,
कभी दफ़्तर की ख्वाहिश में,
रास्तों पर उड़ती हूँ।
कभी मौत के सामने खड़े होती हूँ,
कभी किस्मत से लड़ जाती हूँ।
कितना सुकून मिला, जब मैंने कर दिखाया।
एक साथ सब कर पाना,
कितना मुमकिन है, ये जाना।
मिसाल देने लगे ,
मुझसे जलने लगे,
मेरे ना होने पर भी,
मुझे याद करने लगे।
नेहा भी कुछ कर गुजर गई,
ये कहने लगे।
अस्तित्व को पहचान दिलाके अब दम लूँगी,
नारी नहीं किसी की मोहताज ये मेहनत से साबित कर दूँगी।
कितना सुकून मिला,
जब मैंने कर दिखाया।
-- Neha
मातृभारती के माध्यम से साझा किया.. https://www.matrubharti.com/bites/111168373
-- Neha
मातृभारती के माध्यम से साझा किया.. https://www.matrubharti.com/bites/111168374