#काव्योत्सव 2
कविता
प्रेम
तुमसे है प्रेम कितना
नहीँ है शब्द
तुम्हे बताने के लिए
कोई जतन भी नही
ये तुम्हे जताने के लिए
क्योकिं तुम्हारे शब्द
और मेरे शब्द
व उनके अर्थ
एक हो चुके है
अब तो मैं
तुम्हारी चुप्पी को भी
लेती हूँ सुन
तुम्हारे सपने मेरे सपने
हमारी जमीन पर मिलते हैं
यही वो तल है
जहा हम मिलते है
और पा जातें है
सब कुछ
बिना कुछ कहे
बिना कुछ सुने
एक तृप्त से
अहसास की तरह।
मौलिक व स्वरचित
डॉ.मनीषा शर्मा