वक़्त अब गुजरता नहीं, काटना पड़ता हैं
रात दिन को बराबर हिस्सों मैं बाटना पड़ता हैं
मासूम सा हैं दिल मिलने की झद पे अड़ा हैं
समजाने से ना समजे, तो डाँटना पड़ता हैं
अब क्या समजाए और क्या समजे इश्क़ को
सड़ जाए, जिस्म का हिस्सा तो काटना पड़ता है
भींगे हुए अल्फ़ाज़ मेरे तेरे दिल को छूते क्यूँ नहीं
यहाँ हर रोज़ तकिये को छांटना पड़ता हैं
कल किसीने यूँही पूछा इश्क़ का असर तो,
मैंने कहा सब ठीक बस रात को जागना पड़ता हैं
हिमांशु