*" पसंद और नापसंद में जलन/बेहकावे/ डर जैसा हट जाए तो आनंद ही आनंद "*
?पसंद भी नापसंद बन सकती है और नापसंद भी पसंद बन सकती है बस जो कुछ कर रहे हैं उस में डटे रहे तो सब पसंद ही पसंद आने लगता है | शायद तरीका गलत है इस वजह से कभी नापसंद कर लेते हैं |
?पसंद नहीं फिर भी पापी पेट के लिए करना पड़ता है | "પેટ કરાવે વેઠ " ऐसा ही कुछ तो ऐसा पसंद ही क्युं करना जो खुद को पसंद नहीं तो दुसरे भला कैसे पसंद करेंगे !?! पर ज्यादातर लोग नाम पैसे के पीछे भागते है इसलिए नापसंद काम भी करते है | फिर दलदल से निकला न जाए | तो सोच समझकर ही कीसी भी बात को पसंद करना चाहिए और जो कर रहे है वो अच्छा ही है पर बीना बेहकावे बीना दुसरे से जलन किए बिना किसी के पीछे रेहजाने के डर से करते जाए तो आनंद के साथ जीवन जीया जा सकता है |...ॐD