# Moral story
5. वंश बेल
एक नव- दम्पत्ति का वैवाहिक जीवन बहुत सुखी था। परिवार में हर्ष का वातावरण था। पहली संतान कन्या हुई। दोनों खुश थे कि सब ठीक-ठाक हो गया। मन में कहीं न कही यह विश्वास था कि अगली बार पुत्र ही जन्म लेगा। लेकिन एक के बाद एक, चार कन्याओं के जन्म से परिवार में घोर निराशा छा गयी।हताश हो कर दंपत्ति अपने कुल गुरु जी की शरण में पहुंचे।
”गुरु जी, पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद दीजिये। हमारी चार कन्याएं हैं।”
”ईश्वर ने जो संतान दीं, उसी में खुश रहो। उनके प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन करना तुम्हारा धर्म है।”
”वंश चलाने तथा परिवार का नाम आगे बढ़ाने के लिए एक पुत्र तो होना चाहिए।” अधीर हो कर दंपत्ति ने कहा।
गुरु जी मुस्कराए,”जहाँ तक वंश और परिवार आगे बढ़ाने की बात है तो शंकराचार्य, दयानंद, राम तीर्थ, विवेकानंद आदि ब्रह्मचारी थे। इनका नाम स्वयं इनके सत्कर्मों से प्रसिद्ध हुआ। दूसरी ओर धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे फिर भी उसका वंश आगे नहीं बढ़ा। कपूत होने से, न होना भला।”
गुरु जी ने समझाया –
”तुम अपनी पुत्रियों को समुचित शिक्षा-दीक्षा दो। समय आने पर वे ही तुम्हारा नाम उज्जवल करेंगी और तुम उन पर गर्व करोगे।”
-सविता इन्द्र गुप्ता,
गुरुग्राम , हरियाणा।