#Moral story
3. सुपात्र
एक व्यक्ति महान संत के पास दीक्षा लेने पहुंचा। संत ने कहा- ” पुत्र ! पहले अपने मन पर नियंत्रण करना सीख लो, तब दीक्षा लेने आना।”
व्यक्ति ने कहा -” महात्मन ! मेरा अपनी मनोभावनाओं पर संयम है।“
”ठीक है, पहले एक काम करो। पास के जंगल में मेरे एक मित्र का आश्रम है, उसे जा कर यह डिब्बा दे आओ। हाँ ! मार्ग में इसे खोल कर मत देखना।”
व्यक्ति डिब्बा लेकर चल दिया। बीहड़ जंगल की दुर्गम यात्रा….चलते-चलते थक गया। वह एक वृक्ष के नीचे सुस्ताने के लिए बैठा। मन में तभी एक उत्सुकता जगी –
”ऐसा डिब्बे में क्या है जो देखने तक की भी मनाही …तनिक पता तो लगे।” उसने जैसे ही डिब्बा खोला, उसमें से एक मेंढक फुदक कर बाहर आया और पास के तालाब में चला गया।
व्यक्ति को बड़ा पछतावा हुआ। वह खाली डिब्बा लेकर संत के पास लौट पड़ा। खेद व्यक्त करते हुए बोला- ” क्षमा करें महाराज जी।”
इतना सुन कर संत बोले-”तुम दीक्षा के सुपात्र नहीं हो। जो व्यक्ति कुछ समय के लिए भी अपने मन पर संयम नहीं रख सकता, वह अमूल्य ज्ञान को क्या गुनेगा। मन पर संयम के बिना सिद्धि दुर्लभ है।”
-सविता इन्द्र गुप्ता,
गुरुग्राम , हरियाणा।