माना कि अब हम तेरे तलबगार नही
पर यूं भी नही कि हमें प्यार नहीं
माना कि मुस्कान आती है होंठों पे
पर ये ना समझो कि कोई आज़ार नहीं,
ग़म में डूबा हो ग़र दिल अंदर अंदर
फिर लुभाती कोई महफिल कोई बाज़ार नहीं,
जज़्बात अब भी वही हैं मेरे
पर अब दिल की बातों पे एतबार नहीं।