तसव्वुर की खिड़की से तुम्हे मैं देख रहा हूँ | तुम खामोश हो, सर झुकाए हुए |तुम तो तब भी मुझसे सब बात कर लिया करती थी, जब मैं तुम्हारा कुछ नही लगता था | अब तो मैं तुम्हारा बहुत कुछ हूँ | जन्म से तुम्हारा अपना.सिर्फ़ कुछ दिनों से कुछ गैर | एक खामोशी एक अंधेरे की तरह मेरे तसव्वुर पर छा जाती है कई बार.कितनी कितनी देर तक खिड़की में से कुछ नही दिखायी देता है | कब तुम मुझे नज़र भर कर देखोगी.और कब मेरी रौशनी मेरी तरफ देखेगी ? कब मैं और मेरा तसव्वुर रोशन होंगे ?
मातृभारती पर इस कहानी 'आधी नज्म का पूरा गीत - 24' पढ़ें
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