शेष फिर कभी ...
दो लड़ाइयाँ — दिल्ली पहुँचने के बाद मुझे दो लड़ाइयाँ लड़नी पड़ीं। पहली लड़ाई बाहरी ताक़तों के साथ थी । यह सभी वह बाहरी ताक़तें थी जिन्होंने मुझे दिल्ली पहुँचने से लेकर दिल्ली छोड़ने तक रोज़ परेशान किया या परेशान करने की कोशिश की । बाहरी ताक़तों में सबसे पहले नंबर कमरा दिलाने वाला दलाल का आता है । वह अपने को ब्रोकर बोलता था और हकीकत मे सबके पहले उसने ही ब्रेक किया मुझे और पहले ही दिन एक महीने का किराया दलाली के रूप मे लेकर चला गया । फिर उसी शाम को दूसरी बाहरी ताक़त के रूप मे मकान मालिक आया । मकान मालिक ने एक महीने का किराया सिक्योरिटी डिपॉजिट के रूप मे जमा करवा लिया और एक महीने का किराया एडवांस अलग से लिया । तीन महीने का किराया एक दिन में ही चला गया । पिताजी से ६ महीने का ख़र्चा लेकर आया था और तीन महीने का पैसा पहले दिन ही ख़र्च हो गया ।दो दिन के बाद पता चला कि कमरा दिलाने वाला दलाल मकान मालिक का ही बेटा था । अपने ही घर को किराये पर उठाने के लिये एक महीने का किराया मुझसे दलाली के रूप मे ले गया और उसके बाद रोज़ शाम को पूछता था कि मुझे कोई परेशानी तो नहीं है । उसे देखकर पहली बार महसूस हुआ कि कमीना शब्द आज भी क्यूं इतना जीवंत है और शायद ऐसे ही किसी शख़्स को ही देखकर यह शब्द ईजाद किया गया रहा होगा ।
मकान मालिक अपने ब्रोकर बेटे से भी सौ हाथ आगे था । उसके जीवन का एक ही उद्देश्य था कि कैसे महीने के किराये के अलावा कुछ वसूली की जाये किरायेदारों से ....
शेष फिर कभी ...
@ अंजनी कुमार पांडेय
आयकर उपायुक्त
भारत सरकार