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गरिमा
स्वभाव में काफी भिन्नताएॅं होने के बावज़ूद भी गरिमा मेरी सहेली थी। गरिमा स्वच्छंद ख्याल की,मस्त मिजाज़ ,हॅंसमुख और सदा दूसरों की मदद करने वाली थी। मैं कभी अगर अपनी किसी परेशानियों का जिक्र भी करती तो वह नाराज़ हो कर कहती कि तुम मुॅंह मत खोलना। तुम्हारे हिस्से का क्या मैं आकर बोल दॅूं? मुझे समझाती कि अपनी सही बात को कहने से कभी नहीं डरना चाहिए। गरिमा की शादी संयुक्त परिवार हो गई, वह अभी ससुराल पहुॅंची ही थी कि लोगों की बे फ़िजूल की बातें उसकी कानों में पड़नी शुरु हो गईं। उसके पति अक्षत को 4 दिनों बाद ही आॅफिस के काम से एक वर्ष के लिए विदेश जाना था, ऐसे में गरिमा का समय मायके व ससुराल में गुज़रने लगा।
आखिरकार वो वक्त भी आ ही गया, अक्षत विदेश से लौट आया। हर दिन की तरह उस दिन भी ,जब परिवार के पुरुषों के उठनें के पश्चात् उसी जूठी थाली में महिलाएॅं अपने लिए भोजन परोस रहीं थीं। तभी गरिमा खुद के लिए दूसरी थाली ले आई। सभीं यह देख सकपका गए, सास ने कहा ,बहु तुम क्या कर रही हो? गरिमा ने कहा, माॅं मुझे माफ कर दीजिए, मैं जूठी थाली में नहीं खा सकती। ये बात हमारे सम्मान व स्वास्थ्य की है। जेठानी भी समझाने का प्रयास की किंतु वह अटल रही। गरिमा ने अगले दिन भी वही किया। कहते हैं कि स्वाभिमान व अभिमान के बीच एक लकीर के जितना ही अंतर होता है। कुछ लोग जिसे अभिमान समझ रहे थे दरअसल वो उसके लिए स्वाभिमान था।
..................................अर्चना सिंह ‘जया’