अकेले ही चले....
जिंदगी की पग - दंडी पर,
आगे बढ़ते ही चलें,
पार कर सब मुश्किलें,
अंतिम पड़ाव पर चलें,
अब न कोई डर,
न फिक्र कोई रही ,
छोड़ कर सब कुछ यहां,
अपनी मंजिल को चलें,
थक - हार कर यहां,
हम बैठने वाले नहीं,
अपने हिस्से का सारा काम,
हम करके चलें,
जिंदगी भर यूँही ,
सब के साथ हम रहे,
अब अंत में यहां अकेले हैं,
हम अकेले ही चलें,......
उमा वैष्णव
मौलिक और स्वरचित