English Quote in Story by Manu Vashistha

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#Moral Stories
✍️यक्ष प्रश्न
#मैं #सूत्रधार , मेरा कोई रूप नहीं,किसी के भी #मन की बात जान,उसे अपनी #जुबां दे सकता हूं। आज एक ऐसे ही प्रसंग पर मैं #सूत्रधार बन अपनी प्रतिक्रिया दे रहा हूं।
पुरुषों!!!!! तुम्हारे लिए बहुत आसान होता है ना, महान बनना जब चाहा तब त्याग दिया, और आप महान बन गए!!! यह सारी महानता क्या पत्नी पक्ष को लेकर ही होती है। सीता को त्याग कर राम!आदर्शवादी, लक्ष्मण! पत्नी को छोड़, #महान बन गए, नन्हे राजकुमार, यशोधरा को सोती छोड़, बुद्ध #महात्मा महान हो गए। कहीं ऐसा तो नहीं, #यक्ष प्रश्नों के कोई हल नहीं सूझते, तो आप तुरंत त्याग की मूर्ति बन जाते हैं। #जिम्मेदारी से भी #मुक्त हुए और #महानता भी मिली। कभी सोचा कि उस स्त्री पर क्या बीती होगी, उसने क्या-क्या नहीं सहन किया होगा। आज भी स्त्री ही भेंट चढ़ती रही है। अभी कुछ समय पहले एक दंपत्ति अपनी #ज्ञानपिपासा को शांत करने के लिए अपने कर्तव्यों को भी इतर कर देना, मेरी समझ से परे है। अचानक रातोंरात तो ज्ञानपिपासा #जागृत नहीं होती। वैसे तो मेरा मानना है, होई है वही जो राम रचि राखा।
इसी पर मुझे एक वास्तविक किस्सा याद आ रहा है। काफी पुरानी बात है, मेरी मां की एक सहेली थी। उनकी शादी हुई और उनके पति शादी के तुरंत बाद सन्यासी हो गए।
और कुछ समय पश्चात मेरी मां की सहेली ने यानि मौसी ने, शादीशुदा होने के बावजूद भी घर में रहते हुए सन्यासिन की तरह ही जीवन यापन किया, जब जिसको जरूरत होती (मायके या ससुराल में) काम के लिए, अपनी जरूरत मुताबिक बुला लिया जाता। या यूं कहें, एक कोने से दूसरे कोने में #धकेली जाती रहीं। अब कौन महान था, इसका मुझे पता नहीं, लेकिन मैं सूत्रधार तो बस इतना कहता हूं_ वह सन्यासी बने थे, अपनी मर्जी से। उसमें उन मौसी (मां की सहेली) का क्या दोष था???? फिर भी उन्होंने सहन किया। तो महान कौन हुआ, मन की करने वाला ? या सहन करने वाला ? वृद्धावस्था में जब उन #सन्यासी का स्वास्थ्य गिरने लगा तो वह धीरे-धीरे वापस अपनी ससुराल में मौसी के पास आने लगे। क्योंकि मौसी मायके में ही रहती थीं। वहां सब उनका (मौसी के पति) का बहुत आदर करते थे। लेकिन अब वह उनको अपने साथ ले जाना चाहते थे।उनके मायके वाले भी समझाने लगे कि, चली जाओ ना अपने पति के साथ। देखो वो आज भी तुम्हें पूछ रहे हैं, सन्यासी की सेवा का फल मिलेगा। क्या आपका भी यही मानना है, कि वो व्यक्ति वास्तव में अपनी पत्नी को पूछ रहा था या अपना भविष्य देख रहा था। फिर यह कौन सी महानता थी, क्या उनको अब अपनी सेवा के लिए कोई चाहिए था। या स्त्री का कोई मन नहीं होता वह बस #अनुगामिनी बनकर ही #महानता हासिल कर सकती है, एक यक्ष प्रश्न???? समाज का सारा #दायित्व स्त्री के मजबूत कंधों पर।

English Story by Manu Vashistha : 111122941
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