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दोहरी मानसिकता •••
बाबूलाल और मदन दोनों ऑफिस में बैठे हुए बातें कर रहे थे।
मदन ने बाबूलाल से पूछा-- क्यों बाबूलाल कल ऑफिस क्यों नहीं आए?
बाबूलाल-- दरअसल कल मैं बेटी रोशनी के रिश्ते के लिए गया था।
मदन-- फिर क्या हुआ बात बनी क्या
बाबूलाल-- बात क्या बननी थी मदन। जहाँ जाते हैं वहाँ सब बस एक ही बात शुरू करते हैं।
दहेज में क्या ••••••••••?
और तुम्हें तो पता है मैंने अपनी बेटी रोशनी की पढ़ाई में कितने पैसे खर्च किए हैं। और अब तो उसकी अच्छी नौकरी भी है। लेकिन लोगों की सोच भी ना अभी तक वहीं अटकी है। मैंने तो तय कर लिया है कि मैं अपनी बेटी की शादी मैं बिल्कुल दहेज नहीं दूंगा।
मदन -- हां बिल्कुल सही सोचा है तुमने बाबूलाल। खैर छोड़ो वैसे भी तुम्हारी बेटी रोशनी बहुत अच्छी है। उसे तो अच्छा लड़का मिल ही जायेगा। लेकिन तुम्हारा बेटा उसकी भी तो रिश्ते की बात चली थी कुछ दिन पहले।
बाबूलाल -- हां चली तो थी। लेकिन लड़की वाले कुछ भी देने के लिए मान ही नहीं रहे थे। मैंने अपने बेटे की पढ़ाई में इतने पैसे खर्च किए हैं, तो मैं एकदम सिंपल शादी कैसे कर सकता हूँ ।
इसीलिए मैंने मना कर दिया।
मदन -- बाबूलाल की दोहरी मानसिकता पर मन ही मुस्करा दिया।
नेहा शर्मा।