जो उत्तुंग शिखर खड़े हैं
वही तो मेरा प्यार है,
जो समुद्र सा उछल जाय
वही तो मेरा स्नेह है,
जो हवा सा तुम्हें छू ले
वही तो मेरी प्रीति है।
जो कांटों से बिंधता रहे
वही फूल तो संसार है,
जो जल-थल-नभ को मुड़ता रहे
वही प्यास ही चेतना है,
जो राह अपनी बना ले
वही भाव तो अमर है।
* महेश रौतेला