तेरे हुस्न में इक गज़ब ताज़गी है
भरूँ साँस में आस मन में जगी है।
नये काफियों की नई इक बह्र तुम
ग़ज़ल खूबरू जिसमें पाकीज़गी है।
तुम्हें चाँदनी से सजाया गया तो
अमावस को ईश्वर से नाराज़गी है
सिवा तेरे कोई भजन ही न भाये
यहाँ मन पे बस तेरी ही ख्वाजगी है
मेरे हाथ गर थाम कर तुम चलो तो
ये दुनिया मेरी सल्तनत राजगी है