'ये पुरुष बड़ा महान है।'
ऐ जिंदगानी मैं सच कहूँ ,
ये पुरूष बड़ा महान है।
औरत ममता की मूरत है तो,
ये त्याग की पहिचान है।
जब पिता रूप में हमको मिले।
सानिध्य में जीवन खिले।
करे त्याग हर पल ख्वाहिशों का,
सदियों से चल रहे ये सिलसिले ।
मन में ही रखता हर पल दर्द को,
करता नहीं ये बखान है।
ऐ जिंदगानी मैं सच कहूँ ,
ये पुरूष बड़ा महान है।
भाई रूप में चिंता रखे ।
कोई गैर हमको न छू सके।
जीवन न ये वर्वाद हो,
बन आवरण हमको ढके।
ये निभाता राखी की लाज को,
बाद पिता के मयके की जान है।
ऐ जिंदगानी मैं सच कहूँ ,
ये पुरूष बड़ा महान है।
पिया बन के प्रेम श्रंगार दे।
सूखे मधुवन में आके बहार दे।
इनके बिन जीवन सफेद हैं,
यही तो रंगों का संसार दे।
अंत तक यही रिश्ता साथ देगा,
नारी !क्यों इस बात से अंजान है
ऐ जिंदगानी मैं सच कहूँ
ये पुरूष बड़ा महान है।
बेटा होके, गर माँ से दूर है।
मतलब नहीं की ,वो मगरूर है।
कब तक पिसे दो पाटों के बीच ,
सास-बहु के झगड़ों से मजबूर है ।
समय पर बेटे का फर्ज निभाता है।
माँ के त्याग का भी उसको ज्ञान है।
ऐ जिंदगानी मैं सच कहूँ,
ये पुरूष बड़ा महान है।
सीमा शिवहरे 'सुमन'