जरा सी चोट....
"ज़रा सी चोट को महसूस करके टूट जाते हैं,
सलामत आईने रहते हैं चेहरे टूट जाते हैं।
पनपते हैं यहाँ रिश्ते हिजाबों एहतियातों में,
बहुत बेबाक होते हैं तो, रिश्ते टूट जाते हैं।
दिखाते हैं नहीं जो मुद्दतों तिश्नालबी अपनी,
सुबू के सामने आकर वो प्यासे टूट जाते हैं।
किसी कमजोर की मज़बूत से चाहत यही देगी,
कि मौजें सिर्फ़ छूती हैं,और किनारे टूट जाते हैं।
यही इक आखिरी सच है जो हर रिश्ते पे चस्पा है,
जरूरत के समय पर , अक्सर भरोसे टूट जाते हैं।
गुज़ारिश अब बुज़ुर्गों से यही करना मुनासिब है,
ज़ियादा हो जो उम्मीदें......तो बच्चे टूट जाते हैं।"
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