इस दुनिया में मैं आई थी शायद तेरे लाए
अब भटक रही यूँ तनहा गलियों में।
भ्रम था मेरा या थी मेरी भूल
जो लगा मिले हैं हम यूँ शदियों में।।
तू बेरहम निकला कदर नहीं की मेरी
मैं मानती रही तू जिन्दगी है मेरी।
चाहती रही मैं पागलों की तरह तुझे
तूने अहसास कराया के भूल थी मेरी।।