खामोश सी जिन्दगीयों की
यह संघर्ष की बाते क्या कहे
अब, तुम्हें,
हालाते क्या कहे
जिए जो पल खुशी के
अब याद भी ना रहे
दिए थे जिन्होने होंस्ले
वो हमसफर भी ना आज रहे
जिन्दगी ने रुलाया कुछ ऐसा
की दर्द को भी अब आंसू ना रहे
खामोश सी जिन्दगीयों की
अब, हालाते क्या कहे
कदम कदम पर अब
लड़ख़ती है अरज़ीयां
जिन्दगी के जासबों को
डराती है कमजोरियां
मौत भी जहां
रूझाती हर पल
ऐसेमैं सहारों पर
भरोशा कैसे रहे
खामोश सी जिन्दगीयों की
अब, हालाते क्या कहे