पढ़ते किताब हमने फारे थे
हाथ से पतंग बनाए थे
पापा ने चांटा लगाए थे
मम्मी ने प्यार से समझाएं थी
क्या वह भी अनोखे दिन थे
मिलकर छत पर पतंग उड़ाए थे
जब डोर से उंगली कटी थी
तुने दुपट्टे की पट्टी बनाई थी
तेरे बिन उड़ती है पतंग आज भी
खामोशी जुनून की उड़ती है मन.....