*सुन्दर कविता जरूर पडें* *आज की है*
मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।
छोड़ कर क्यूं यूं चली गई,देकर दिल मे पीड़ा।।
तू छोड़ गई दिल की रजधानी
बहता बस आंखों से पानी ।
कटती नहीं ये रात की रानी
दिल भी करता है मन मानी।
तू ये क्या खेल रही है,बच्चो वाली क्रीड़ा।
मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।
कभी कभी लम्बी बातों मे
छोटे छोटे विवाद हो जाते।
कभी कभी बिन बोले ही
बड़े-बड़े संवाद हो जाते।
कभी कभी बिन चोटों के ही,दे जाती यूं पीड़ा।
मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।।
चपल नैन चितवन है तेरी
कुछ दिन पहले बोली थी।
वही नैन बन गया चकोर
जिस दिन नफरत बोली थी।
ऐसे क्यूं लगता है मुझको,तुझे हुआ प्रेम से ज्रीड़ा।
मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।।
शायद मैं भी भूल जाऊँगा
पर दिल मे दर्द तो होता है।
वो बेवफा क्या जाने
बस मर्द ही मर्द तो होता है।
माना की जिस्मो ने जिस्मो से खेला है क्रीड़ा।
मेरी उन जज़्बातो मे थी,बस थोड़ी सी व्रीड़ा।।
*"प्रिन्शु लोकेश तिवारी"*