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शिर्षक - स्वप्न
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सखे त्या नदीच्या काठावर स्वप्न माझे रंगायचे
तुझ्या आठवणीत सखे जगणे असे सरायचे
खळखळून वाहे नदी चित्र आपले न्याहळायचो
रोज रोज त्या नदी काठी मी स्वप्न बघाया बसायचो
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सोनल सुनंदा श्रीधर
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