समेट रही हूँ
सहज रही हूँ
घर की हर बिखरी चीज को
पुराने फोटो
पुराना ,पर महंगा फर्नीचर
कभी घर के पूर्वजों को मिले
कई अवसरों पर मिले उपहार
यूँ ही बनी रहे इनकी चमक
साल दर साल
और गर्व करे आने वाली पीढ़ी
और घर में आया हर मेहमान
इस की चमक को खोना नही है
इस लिए लिए हर पहर इनको झाड़ पौंछ के
घर के हर कोने में सज़ा रही हूँ
यह चीजे चमक खो के भी
अपने अस्तित्व का एहसास करवा देती हैं
पर नही सहज पाती मैं
उन पुरानी किताबों से
वह धूमिल होते अक्षर
वह अमूल्य हमारी धरोहर
वो शब्द जो पहचान थे हमारी
सत्य ,प्रेम .उदारता और संवेदना
जैसे मेरे हाथो से सहजने की कोशिश में
पल दर पल दूर हुए जा रहे हैं
अपनी चमक खोये जा रहे हैं !!
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