वर्षों से उजाला हमें
धोता रहा, धोता रहा,धोता रहा
और हम मैल को रगड़ते रहे।
वर्षों से सत्य हमें
पुकारता रहा
और हम झूठ की तरफ मुड़ते गये।
वर्षों हमने ईमानदारी का पाठ पढ़ा
और हम ईमानदार नहीं रह पाये।
"सत्यमेव जयते" लिखते-लिखते
हम सम्पूर्णता को काटते रहे।
-महेश रौतेला