मैं भटका-भटका रहता था
तुम मौन-मौन से रहते थे,
धूप ,धूप सी होती थी
मन अपना ही प्रतियोगी था।
तुम आकाश से बन जाते थे
आकाश से क्या कहना था?
धरती के फूलों से
मुझे रिश्ता अपना रखना था।
सब भू -भागों में
मेरा भू-भाग अद्भुत था,
जहाँ मैं भटका-भटका रहता था
तुम मौन-मौन से रहते थे।"
महेश रौतेला