◆ रस से भरी जिंदगी ◆ 3
राजमाता ने देखा इमरती के चेहरे पर तनिक भी शिकन न थी ..मेहनत और आत्मतेज से उसका चेहरा चमक रहा था।
"पर देखा जाए तो परेशानियों से भरी है तेरी जिंदगी ..औरत होकर इतना कुछ कर रही पति के लिए ..वो क्या कहते हैं जलेबी की तरह टेढ़ी है तेरी जिंदगी !"
" क्यों अगर मैं बीमार होती तो मेरे पति न करते ये सब मेरे लिए ? ..और हां माँ जी ..टेढ़ी मेढ़ी तो है पर रस से भरी ही है मेरी जिंदगी इन जलेबियों की तरह ..!"
राजमाता अवाक रह गयी ..इमरती के इस आत्मविश्वास पूर्ण प्रत्युत्तर से ..! उन्हें लगा था , धन व सुविधाओ के अभाव में प्रेम उड़नछू हो जाएगा ..और कुंवर लौट आएगा या फिर शायद सत्ता और वैभव के लालच में इस हलवाई की लड़की ने कुंवर को फांस लिया है जब राजसुख ही नही होगा तो ये खुद बखुद छोड़ भाग खड़ी होएगी ..पर यहां तो कुछ और ही स्थिति है ...इनका प्रेम तो दुखों की आग में तपकर सोना बन गया है ...! राजमाता मन ही मन पछतावे से भर उठी और गाड़ी की ओर बढ़ चली ..!
गाड़ी में बैठ कर बस इतना ही कहा "दीवान जी जल्दी घर चलिए हमें बहुत सी गलतियो का आभास हो गया है , कुंवर को वापस घर लाना है , वो दोनों जीत गए ..मैं ही अपने धन और वैभव के घमंड में डूबी रही ..सच प्रेम महल और वैभव में बंध नही सकता यदि ऐसा होता तो राजा साहब मुझे वर्षों पूर्व त्याग कर न चले जाते ...और मेरी जिंदगी से खुशियां न रूठती.. ! न जाने क्या था उस स्त्री में जो मुझमे नही था ..हो सकता है यही व्यर्थ अभिमान ,धन, सत्ता ,ऐश्वर्य के झूठे प्रलोभन मुझे बांधे हुए थे कि, वो सब छोड़ कर आ ही जायेंगे ..! प्रेम तत्व की व्यापक परिभाषा कभी समझ आयी ही नही थी मुझे ..किंतु आज इन जलेबियों ने और कुंवर की इमरो ने दिखा दिया ।
आज समझ आ गया है मुझे की , जिंदगी टेढ़ी मेढ़ी हो तो भी रस से भरी हो सकती है जलेबियों की तरह ..!
-कविता जयन्त