लहू से लाल हो गयी धरती
हिंसा हो गई आम
बदलाव चाहता नहीं कोई
बस बदला है सबका मुकाम
अमीर गरीब छूत अछूत
बट के रेह गया है आवाम
सोच की सेहत हुई खराब
सत्य हुआ है बदनाम
समझाना नहीं अब किसको
बस बताना ही है काम
सुनना भी कौन चाहता है
समझ को देते सब इल्जाम
शस्त्रों की ताकत लगती ज्यादा
कम हो गया जीवन का दाम
प्रेम की भासा भूल गए
हर जुबान पर नफरत का पैगाम
धोखा स्वभाव बन गया
विश्वास की होली जले सुबह शाम
स्वाभिमान बन गया श्राप
इज्जत की होली खेले सरे आम
अधर्म करे लोग अब
लेकर धर्म का नाम
मजहब की लड़ाई हो रही
जैसे अल्लाह से नाराज है राम
जीवन से भरी इस धरती को
बना दिया है मृत्यु धाम
मानव-मुर्खता कारण उसका
विनाश ही है बस एक अंजाम।