प्रखर इस तेज का
तुम्हीं तो एक प्रमाण हो
प्रगाढ़ इस प्यार का
तुम्हीं विशिष्ट स्रोत हो।
इतने रिक्त स्थान में
कहीं तो भगवान हैं,
इस अव्यक्त सी तपस्या में
सर्वत्र ,आत्मतत्व व्यापत है।
कहाँ शून्य की कल्पना है,
कहाँ अनन्त का स्थान है?
इस ज्ञान के दायरे में
सम्पूर्ण दिव्य प्रभाव है।
इस कालचक्र के लिए
तुम्हीं शक्ति स्वरूप हो,
इस नाचते मनुष्य का
तुम्हीं दिव्य विराम हो।
काट-छाँट जो चली है
तुम्हीं अखिल विचार हो,
शब्द से गीत तक
तुम्हीं यात्रा के साथ हो।
*** महेश रौतेला