रुको
नारी हु कोई गुलाम नही तेरी।
यह हाथ जो तेरे आगे बड़े है ।
तोड़ के हाथ मे दे सकती हूँ ।
यह आंखे जो तेरी मेरे तन पे रुकी है।
फोड़ के अंधा कर सकती हूं ।
रुको
नारी हु कोई गुलाम नही तेरी ।
कल तक तो बात करता था बेटी पढ़ाएंगे ।
आज तू उनके साथ क्यों है जो बेटी जलाएंगे।
कल्पना, सुनीता , या इंदिरा भी में बन सकती।
सांस मेरी युही बीच मार्ग में ना रोकी जाती।
डर है तुझको तुजसे आगे निकल जाउंगी पुरुषो के मेले में।
चल जा ए पुरुषवादी गीदड़ तुजसे कहा में मात पाउंगी।
कंधे से कंधा अब मेरा भी मिलने लगा है।
यही सोच में तेरा सिंहासन हिलने लगा है।
रुको
नारी हु कोई गुलाम नही तेरी।
- कुमार