अंधेरी रातों से नहीं लगता डर,
क्योंकि रातें अपने आगोश में सुला देती है,
डर रोशनी की किरणों से लगता है क्योंकि
रोशनी साफ-साफ दिखा देती है
मैं अब कुछ देखना नहीं चाहता मैं बस अब सुकून चाहता हूं ,
अजनबी तुम पूछोगे तुम्हें किस बात का दर्द है...,
पर आपके सवालों को सुनना ही नहीं चाहता,
क्योंकि समझाना मुझे आता नहीं और खामोशी तुम समझ नहीं पाओगे ।
मैं कविता नहीं कहता, ना पता है कि कविता क्या होती है मुझे
मैं नहीं जानता बस लिखता हूं, जब समझ नहीं पाता खुद को
उलझ जाता हूं अपने ही एहसासों में, तब उतार लेता हूं शब्दों को कागज पर
तुम्हें कभी पसंद आएंगी तो..., कभी समय की बर्बादी लगेगी,
क्योंकि मैं बस लिखता हूं ...जब मेरा वजूद नहीं समझता मैं .
दर्द सांस नहीं लेने देता...मुझे घुटन सी होती है, तब उधार मांग कर आता हूं शब्दों से..
उधार मांग कर ले आता हूं कुछ और निकाल देता हूं अपने दिल में छुपी हुई बाते,
बात अजीब है मुझे पता है, मुझे पता है कि मैं लिखता हूं जब,,,
कुछ कहना चाहता हूं ,पर मैं कह नहीं पाता ,
कुछ सुनना चाहता हूं पर आवाज नहीं होती ,
सोना चाहता हूं ,पर नींद नहीं आती ,
रोना चाहता हूं पर आंसू नहीं होते,
मुझे नहीं पता लिखावट के कायदे, मन बहेलाने वाली सारी कवायते..
में लिखता हूं जब खुद के आगे हार जाना चाहता हूं,,, में बस अब ठहेर जाना जाता हूं , मे बस अब रिहाई चाहता हूं.....,
-- Anil Vaghela