जंगल में जो धूप बिछी है
घूंट-घूंट कर पीता हूँ,
आकाश से जो बूँद गिरी है
नाच-नाच के छूता हूँ।
जो आता है, वह जाता है
कल वह धूप फिर लौटेगी,
आकाश में जो रहस्य रहेगा
खट्टा-मीठा हमें मिलेगा।
हिमगिरि पर बर्फ गिरी है
धूप गुनगुनी लगती है,
आकाश में जब मन खुलता है
शैल-शिखर सा वह बनता है।
**महेश रौतेला