मैं प्यार के खातिर
कभी-कभी दौड़ लगा लेता हूँ,
घर पर लम्बी कल्पनाएं कर लेता हूँ
बाहर जाकर आकाश में झांक लेता हूँ,
कभी-कभी नक्षत्रों को गिन लेता हूँ,
कभी फूल हाथ में लेकर घूमता हूँ,
मैं जानता हूँ प्यार में निराशा हो सकती है,
फिर भी मैं उस हाथ को पकड़ लेता हूँ
जिसे मैंने कभी पढ़ा नहीं है।
प्यार समाप्त नहीं होता है
उसकी लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई कम हो सकती है,
पर वह मर नहीं सकता है।
ईश्वर की तरह जिन्दा रहता है प्यार,
उसका अन्वेषण नहीं करना पड़ता है,
न उसके लिए पहाड़ खोदना पड़ता है,
वह स्वयंभू है।
पशु-पक्षियों से लेकर मनुष्य तक,
उड़ता है, लेकिन बैठता है जरूर,
रूलाता है, पर ढ़ाढस भी बँधाता है।
**महेश रौतेला