इसबार मैंने उससे कहा-
पहाड़ जा रहे हो तो
थोड़ी सी बरफ ले आना
बरफ न ला सको तो
उसकी चमक ले आना,
नन्दा के आशीर्वाद ले लाना
शिव को प्रणाम कह देना
ग्वैल ज्यू के मंदिर में टकी चिट्ठियां पढ़ आना
कहते हैं वे न्याय के देवता हैं,
मन्नत एक-दो तुम भी रख आना
उनका इतिहास मैं नहीं जानता
हो सके तो उसे रट लाना।
हो सके तो
नैनीताल में पड़ा
प्यार ले आना।
मैं तुम्हें कहीं नहीं दिखूंगा
तो महाविद्यालय के किसी पट्टिका पर
मेरा नाम देख लेना
क्या पता अब वह मिट चुका हो!
महाविद्यालय से कहना
"मैं उसे बहुत याद करता हूँ,"
लड़के जो ईर्ष्या में थे
लड़कियां जो हँसती नहीं थीं
दोस्त जो सपने बनाते थे
कहना याद आते हैं।
पुस्तकालय में जा
धूलभरी, मुस्कराती
मेरी किताबें पलट आना।
भाषण स्थलों पर
एक मुस्कान बिखेर आना,
आपातकाल में जहाँ पोस्टर लगाये
उस दीवार को एक नजर देख लेना।
परिवर्तन तो अब भी होते होंगे
कुछ मन में, कुछ मंदिर मे।
गूगल पर देखना
कौन क्या लिख रहा है
कितना उजाला कहाँ है
विश्व में लोग कहाँ हैं
और हम मंदिर-मस्जिद में खड़े
जनसंख्या में अव्वल हैं।
छोड़ो, ऊँची चोटियों की मुट्ठी भर धूप ले आना
शराब मत पीना
साथ में शराब की बोतल मत ले आना।
हो सके तो
विद्यालय की घंटी बजा आना
शिक्षकों को प्रणाम बोल देना,
सीढ़ीनुमा खेतों पर
एक गाना गा आना,
काफल के पेड़ पर हो आना
फल नहीं, तो छाया ही ले आना।
कहीं पर लिख आना
"आपके पास यदि पैसे हैं
तो आप नाच भी सकते हैं
और नचा भी सकते हैं।"
*** महेश रौतेला