जिन्दगी क्या मैं तुझसे शिकवा करूं ?
जब अपने
ही हमसे खफा हो गए ।
कल तलक जो हमारे थे अपने सभी ,
आज हम से भी वह खफा हो गए ।
महफिले उजड़ी सूनी गलियां हुई ,
जब अपने ही दर से दफा हो गए ।
तेरी चाहते थी इबादत मेरी ,
क्या गुजरी है जबसे खफा हो गए ?
जो गुलशन सजाए थे हमने कभी,
करके बेगाने आलम रफा हो गए ।
कौन सा गीत गाँऊ या ग़ज़ल मैं सुनूँ ,
अब तो सारे तराने सफा हो गए ।
॥ नमिता गुप्ता ॥