प्रेम
अपनी पुरानी किताबें और कागज़ों को समेट रहे थे।
अचानक हाथ में आ गए उनके लिखे ख़त ,
जो रखे थे किसी बड़े से लिफ़ाफ़े में।
खोल के एक-एक कर पढ़ना शुरू किया,
जो ले गए उन दिनों की यादोंं में ।
शायराना अंदाज था उनका।
तभी तो खत़ मिलने में 'सेहरा में शबनम मिला' लिखते।
साथ में शिकायत भी रहती थी कि ,
तुम्हारे ख़त किसी शासकीय पत्रोँ की तरह ज्यादा होते हैं।
मगर ये सब बातें फ़साना हो गयी, जो न लौट सके,वो ज़माना हो गयीं। आंसुओं ने सब धुंधला कर दिया था।
दो बूंदें गालों पर ठहर गयीं, जो शबनम की तरह लग रहीं थीं।
अमृता शुक्ला