जाड़ों की हल्की धूप की तरह
जिन्दगी को कुछ हल्का कर दूँ,
सारे पीले पत्ते झाड़
बसंत की आशा जगा दूँ।
कुछ पहाड़ हटा दूँ,
कुछ बाढ़ रोक दूँ,
कुछ बातों को मौन कर दूँ
कुछ भाषणों को काट दूँ।
कुछ स्वार्थों को दफना दूँ
कुछ राहों को बंद कर दूँ
कुछ आस्थाओं बुझा दूँ
जिन्दगी को कुछ हल्का कर दूँ।
बिस्तर सा कुछ समेट दूँ
जंगल सा कुछ हराभरा कर दूँ,
खिड़कियों से शुद्ध हवा आने दूँ
जिन्दगी को कुछ हल्का कर दूँ।
*महेश रौतेला