कविता सुनहरी चंचल धूप
सर्दियों की सुनहरी चंचल धूप,
अक्सर मेरे आँगन की मुंडेर पर
आकर बैठ जाती है ।
मैँ कुछ नहीं कहती तो धीरे-धीरे
चुपके से, पूरे आँगन में लेट जाती है।
हक ज़माने लगती है पूरे ही घर पर मेरे,
गर बंद हो दरवाज़ा तो झरोखों से,
झाँकने लग जाती है ,
मेरे हर छोटे-बड़े काम को
ताकने लग जाती है ।
देख ,बढ़ी-पापड
लगाती है फेरा
करती है सौदेबाजी, कहती है
आधा तेरा, आधा मेरा ।
एक किलो पापड़,
आधा किलो ही घर में आते हैं ।
अब तो हर जगह, छोटे-बड़े काम के,
दाम लिए जाते हैँ ।
लौट जाता है धूप का झुरमुट,
पूरब से पश्चिम की थकान लिए
सुबह फिर लोट आने का वादा कर,
हमारी उम्मीदों का नया मकान लिए ।
दूसरे रोज़ बिल्कुल सही वक्त पर
उपस्थिती लगाई जाती है ।
इतनी ईमानदारी तो सिर्फ
प्रकृति में ही पाई जाती है।
सीमा शिवहरे "सुमन"