और अंत में जब मै उठा चलने को,
विद्वानों की सभा से,
एक बुजुर्ग ने बड़े प्यार से बोला,
बाबूजी आप भी वही जा रहे हो क्या,
जहां मुझे भी जाना है?
जरा ये मेरा झोला भी थाम लो,
मै कमजोर हो गया हूं अब खुद का वजन नहीं उठता,
आप अपना लेकर जा रहे ही रहे हो,
इतने सारे जमाए जो,
मेरा भी एक रख लो,
वही मुझे पकड़ा देना।
बड़ा सरल सवाल था वो,
पर उस दिन के बाद मैंने चीजे जमानी छोड़ दी,
क्या सच में संभव है वो काम?
अंत में यज्ञ से बची सामग्री को लेकर आना।
© Krishna Kumar 2018