अपनों के मोहबंध की दासी हूँ।
जैसे शशि को तकता चकोर हर रात्रि में
उसी भांति बस चन्द्रकिरण की प्यासी हूँ
ज्यों मन में स्थिरता रखकर चातक बैठा
उसी तरह स्वाति की बूंद हेतु अकुलाती हूँ
पूछ रहे सब क्यों इतना धैर्य मैं धरती
कैसे भला बताऊँ?
मैं भी अपनों के मोहबंध की दासी हूँ।
जैसे सूरज का स्पर्श ताप जलाता संज्ञा को
ठीक वैसे ही तीव्र सी दहक देह पर पाती हूँ
ज्यों कंटक छलनी कर देते समीप के पुष्प को
कभी-कभी वैसी ही वेदना की पीड़ा पाती हूँ
पूछ रहे सभी क्यों प्रतिवाद नहीं करती
कैसे भला बताऊँ?
मैं भी अपनों के मोहबंध की दासी हूँ।
जैसे नदिया मीलों बहकर ग़ुम हो जाती सागर में
वैसे ही पीहर में पीछे छोड़ के अपना नाम
त्यों हर दुरूह मार्ग को संग हंसकर पार किया
ठीक उसी तरह पाने को मैंने अपना निज धाम
पूछ रहे सभी क्यों सर्वस्व तज डाला
कैसे भला बताऊँ?
मैं भी अपनों के मोहबंध की दासी हूँ।
जैसे नगर तंत्र में एक राजा है होता
वैसे ही मुझे भी कहते सब गृहस्वामिनी
जैसे प्रजा हित में वो सदैव ही तत्पर रहता
वैसे ही परहित न्योछावर सी मैं सुभागिनी
पूछ रहे सभी क्यों दूजों को समर्पित हूँ
कैसे भला बताऊँ?
मैं भी अपनों के मोहबंध की दासी हूँ।
जैसे नीर भरी बदली ख़ुल के बरस जाती है
उसी भांति बैठे-बैठे अश्रुधारा बह जाती है
ज्यों रज महकती सावन बूंदों से मिलकर
उसी तरह ये अधर मुस्कान चहक जाती है
पूछते सब क्यों है ये मिश्रित मनभाव निराला
कैसे भला बताऊँ?
मैं भी अपनों के मोहबंध में सर्वसुख पाती हूँ।
☘☘☘⚜⚜⚜☘☘☘
~ स्मृति तिवारी 'मुक्त ईहा'
••✍✍✍
© Smriti Tiwari?
Facebook? : Smriti Mukht iiha
Instagram❤ : Smriti_mukht_iiha
➖➖➖➖
#smit ? #Smriti_Mukht_iiha