शिला थी मैं मूर्तिकार बन गए तुम,
उकेरा तराशा संवारा मुझे
प्यार से दुलार से हथौड़े की मार से
चोट लगी दर्द हुआ आह भी निकली
पर स्पर्श तुम्हारा पत्थर को पिघलाता गया।
मूर्ति की शक्ल इख्तियार की एक शिला ने।
नख से शिख तक सौन्दर्य छलकता हुआ।
असतित्व बदला, पहचान बदली
तमाम लोगों ने सराहा कई बार
पर मूर्ति पर कोई प्रभाव कैसे हो सकता है?
उसे तो सिर्फ स्पर्श की पहचान है, अपने मूर्तिकार की
जब तुम छूते हो तो ये मूर्ति बोलती है।
तुम हो तो सौंदर्य है मेरा अन्यथा आज भी एक
कोरी शिला हूँ मैं।
~पूर्णिमा~