फसा रहता हूं दुनिया की उलझन में,
काम में, कुछ काम की कुछ फ़िज़ूल की,
हाफता रहता हूं,
पसीने से लथपथ,
भागता रहता हूं,
पता नहीं क्यों,
पूरे दिन और कभी कभी रात में,
एक अंध दौड़ में,
पर तभी जब खुद को पाता हूं,
उन कविताओं की बीच,
जो सिची गई है किसी प्यारे कवि के लेखनी से,
पाता हूं, अपने आप को ठंडे छाव में,
एक विशाल बृक्ष के नीचे,
और फिर पूरे दिन की थकावट भी जाती रहती।
-Krishna Katyayan 2018