रात भर बरसी बूँदे मिल गयी ख़ाक में
भटकी हुई रात रोशनी को तरसती रही
लिखते रहे अल्फ़ाज़ रात भर नाम किसका
यह किसकी याद दिल में दबे पाँव चलती रही
रूह क़ैद है बदन में, बदन इस जहाँ में क़ैद है
ज़िंदगी इसी सिलसिले को ले कर आगे बढ़ती रही
क्यूँ चले आते हैं दिन क्यूँ चली आती हैं रातें
ऐसे कई सवालो का जवाब मेरी ज़िंदगी बुनती रही !!