बचपन
अब नही गूंथती मैं आटे को मन से
याद आता है मां मुझे वो खेल खेल का आटा गूंथना
वो आटे का पहाड़ बना कर बीच मे करना गड्ढा ...
फिर डाल जल की एक धार ...उसे सूखे आटे से ढंकना ....
फिर एक उंगली से पानी की वो छोटी नदी बहाना ...
और फैले जल से उस परात में कीचड़ खूब बनाना ....
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कहाँ खो गया अब वो बचपन
वो खेल खिलौने और खिलवाड़....
वो नीम की छांव, मिट्टी के गगरे वो झूले ..
वो आंगन, वो सीढ़ी और वो किवाड़ ...
...
अब तो जल्दी होती है सुबह काम पर जाने और भेजने की ...
कहां रह गयी है फुर्सत ..अब बीते पलछिन सहेजने की ..
न जाने कब गूंथ कर आटा ..
मैं बना लेती हूं रोटियां
रखती हूँ बालो को लपेट कर यूँ ही ,
अब माँ जो नही बनाने को चोटियां ..
...
सच कितना अमूल्य होता है ये बचपन
गाहे बगाहे याद आता है हर एक क्षण..
बस यादों में ही रह जाता है कहीं विस्मृत सा
जो फिसल जाता है मुठ्ठी से ,जैसे रेतकण..!
-कविता जयन्त श्रीवास्तव