जिन्दगी ऑर मौत का फासला कितना होता है कोई
नहीं जानता फिर भी इंसान एक ऐसा पुतला है जो
ये जानते हुए भी कि उसकी इछाए कभी पूरी नहीं होगी। ऑर उसे एक दिन मौत को गले लगाना है फिर भी संतुष्ट नहीं रहता ,??कर्म तो इनसान के हक मै है ऑर कर्म करना भी चाहिए पर कर्म हर एक इंसान करता है ऑर उस कर्म के पीछे सुख ढूंढता है हर कर्म के पीछे सुख हो ऐसा तो हो नहीं सकता पर हर कर्म करने के पीछे फल जरूर मिलता है बुरे का बुरा ऑर अच्छे अच्छा ! इतनी इच्छये इतनी सोच इतना दिमाग कहां खर्च करे की संतुष्टी मिले ये तो कुदरत की देन है
क्या इस संसार मै कोई संतुष्ट व्यक्ति मिल सकता है???
क्या कोई बिना इच्छा वाला व्यक्ति मिल सकता है???