हम बहुत सी यात्राएं भगवान के लिए करते हैं,
चढ़ जाते हैं पहाड़, नहा लेते हैं बहुत ठंडे जल से,
नंगे पैर ढूंढने निकल पड़ते हैं अज्ञात को,
जल से, फूल से नमन कर देते हैं,
डुबकियों में याद कर लेते हैं पितरों को,
फिर बिना संदेश लौट आते हैं घर, आस्था के साथ।
कुछ दिन खेत में बिताइए,बीज रोपिये,
इसे भी भगवान का एक तीर्थ समझिये,
देखिये कैसे बीज उगता है,
कैसे फसल लहलहाती है,
एकदम शब्दों की तरह पौधे दिखेंगे,
किसान लेखक की तरह सोच रहा होगा,
कागज पर नहीं, खेत पर लिख रहा होगा,
अन्न को देवता कहते हैं हमारे ग्रंथ,
कुछ दिन खेत में बिताइए,बीज रोपिये,
पेट भर आयेगा,भूख मर जायेगी।
***महेश रौतेला