#Kavyotsav
संवेदना ले आओं।
मिलते जो कहीं मैं ले आता,
मैं संवेदना के बीज,
कुछ के वृक्ष लगाता,
कुछ के बनवाता ताबीज़।
वृक्ष फूलते-फलते फिर संवेदनाएं उगती,
शायद इनके फल खाकर सबमें,
संवेदनाएं जगती।
कुछ बीजों में मंतर पढ़कर,
ताबीज बनाएं जाते।
लोगों को सम्मोहित करते,
संवेदनाएं कभी जगाते।
खुदगर्जी के सब है मारे,
हो गए पत्थर ये सारें।
अन्याय को होता देख,
चुप कैसे रह जाते है।
जैसे रहे होंगे जन्मांध,
सब आगे बढ़ जाते है।
मन के भावों पर जमी है काई,
ठहरा है मन का पानी।
या सूखा-सूखा रेतीला है,
ये मन है रेगिस्तानी।
जैसे होता कोई यंत्र,
ऐसे चलते फिरते है।
संवेदनाओं का चाहे स्नेहन,
इनके जो कलपुर्जे है।
जैसे खिलौने में भरते चाबी,
क्रियाकलाप वो करता है।
भावनाओं की उसमें भर दो चाबी,
वो जो मानव जैसा दिखता है।
कविता नागर
30/09/18