याद है नाम तुम्हें वो गलियां, वो छत और तुम्हारे घर का वह दरवाजा जहां तुम अक्सर मुझे दिखा करती थी।
मैं आज भी कई बार उन रास्तो से निकलता हूं, मगर मुझे तुम कहीं भी नजर नहीं आती।
वो रास्ते तुम्हारे कदमों की आहट के बिना सूने-सूने( खामोश ) से लगते हैं।
कहने को तो कुछ नहीं बदला, पर मेरी नजर से देखें कि, वहां अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा।
कहने को तो मैं आज भी वही हूं पहले जैसा, पर मुझमें अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा।
हो सके तो लौटकर वापस आ जाओ, वो रास्ते हम दोनों का आज भी इंतजार करते हैं, पर ये मुमकिन नहीं, में जानता हूं।
कसम से जिंदगी खाली-खाली सी है, तुम्हारे बिना।।।।।। मन के तार।।।।।।