#Kavyotsav
कच्ची डोर
कच्ची डोर, और कच्चे रिश्ते
टूट ही जाते है.
ऐसे भी
मेरी पतंग की डोर ज्यादा कटती है,
पर मेरे दोस्त,
ये जीवन की डोर बार बार टूट कर भी बंध क्यों जाती है ?
तुम अपने जीवन के बेहतरीन पल को कैसे बयाँ करोगें ?
पहले प्यार की खुशबू, जैसे पहली बारिश की महक
तुम्हारा मिलना और वक्त का तेजी से दौड़ना
कुछ देर ठहर के उस खाली जगह को देखता हूँ
मेरे दोस्त,
तुम समझ रहे हो न ?
वह बेहतरीन पल ही हमें ले जाते है सूने खालीपन की तरफ
कुछ रिश्ते बेनाम से होते है,
पहली बारीश में उग आये खुबसूरत पौधे की तरह
सुन्दर, कोमल, एक अहसास भर सा रूमानी
और फिर धूप आने पर सुख जाना.
मेरे दोस्त,
तुम कहते हो यही अंत है, यही नियति है,
कच्ची डोर, कच्चे रिश्तो का.
मेरे लिए तो इन्तजार है
अगली बारीश का....
- हरेश परमार